‘ऑपरेशन बेलपत्र’ की ऐतिहासिक सफलता, श्री दिलीप जी के संकल्प को मिला साकार रूप
वाराणसी, 8 जुलाई। काशीवासियों के लिए लंबे समय से प्रतीक्षित एक महत्वपूर्ण सुविधा अब साकार हो गई है। श्री काशी विश्वनाथ मंदिर में स्थानीय निवासियों के लिए ‘काशी द्वार (4B)’ को विशेष रूप से आरक्षित कर दिया गया है। इस व्यवस्था के लागू होने के बाद अब काशीवासियों को बाबा श्री काशी विश्वनाथ के दर्शन के लिए घंटों लंबी कतारों में प्रतीक्षा नहीं करनी पड़ेगी। यह द्वार प्रतिदिन प्रातः 4:15 बजे से रात्रि 10:45 बजे तक स्थानीय निवासियों के लिए खुला रहेगा।
श्री रुद्राभिषेक पीठ काशी के सह सचिव श्री अम्बरीश राय ने इस ऐतिहासिक निर्णय का स्वागत करते हुए कहा कि यह काशीवासियों की आस्था, भावना और वर्षों की अपेक्षा का सम्मान है। उन्होंने कहा कि इस उपलब्धि के पीछे ‘ऑपरेशन बेलपत्र’ अभियान की सफलता और श्री शिव बारात के संस्थापक श्री दिलीप जी का अथक परिश्रम, अडिग संकल्प एवं बाबा विश्वनाथ के प्रति अगाध श्रद्धा प्रमुख प्रेरक शक्ति रही है।
उन्होंने कहा कि श्री दिलीप जी ने सदैव यह भावना रखी कि काशी के नागरिकों को अपने आराध्य बाबा श्री काशी विश्वनाथ के दर्शन के लिए अनावश्यक कठिनाइयों का सामना न करना पड़े। इसी उद्देश्य को लेकर उन्होंने निरंतर प्रयास किए और संबंधित स्तरों पर सकारात्मक संवाद स्थापित किया। उनके समर्पण, धैर्य और दृढ़ इच्छाशक्ति के परिणामस्वरूप आज यह व्यवस्था मूर्त रूप ले सकी है।
श्री अम्बरीश राय ने उत्तर प्रदेश के माननीय मुख्यमंत्री श्री योगी आदित्यनाथ जी का भी हृदय से आभार व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि मुख्यमंत्री जी ने काशीवासियों की भावनाओं का सम्मान करते हुए अपने कर-कमलों से इस जनहितकारी व्यवस्था का शुभारंभ किया। यह निर्णय न केवल स्थानीय श्रद्धालुओं की सुविधा बढ़ाएगा, बल्कि काशी की धार्मिक परंपराओं और सांस्कृतिक गरिमा को भी और अधिक सशक्त करेगा।
उन्होंने काशीवासियों से आग्रह किया कि वे इस सुविधा का लाभ उठाते हुए मंदिर प्रशासन द्वारा निर्धारित नियमों एवं व्यवस्थाओं का पूर्ण पालन करें, जिससे यह व्यवस्था निरंतर सुचारु रूप से संचालित होती रहे और अधिकाधिक श्रद्धालु इसका लाभ प्राप्त कर सकें।
श्री रुद्राभिषेक पीठ काशी की ओर से श्री दिलीप जी के प्रति विशेष आभार व्यक्त करते हुए कहा गया कि उनका यह प्रयास सदैव काशीवासियों द्वारा स्मरण किया जाएगा। समाजहित में किए गए उनके इस योगदान ने यह सिद्ध कर दिया है कि यदि संकल्प दृढ़ हो और उद्देश्य जनकल्याण का हो, तो परिवर्तन अवश्य संभव होता है।

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