भगवान बुद्ध को Light Of Asia यानि एशिया का प्रकाश कहा जाता है।
भारतीय प्राचीन वास्तुकला की एक भव्य रचना महाबोधि मन्दिर बौद्धगया एवं उसमें स्थापित भगवान बुद्ध की विश्वप्रसिद्ध मूर्ति जो संसार की सर्वाधिक सुन्दर रचनाओं में से एक है। यह शानदार वास्तुकला के साथ-साथ प्राचीन ईंट संरचना का एक बेहतरीन उदाहरण है। इसके मुख्य टावर की ऊँचाई 55 मीटर है।

लोगों में ऐसी मान्यता है कि महाबोधि मंदिर में स्थापित बुद्ध की मूर्ति स्वयं महात्मा बुद्ध ने बनाया था। कहा जाता है कि जब इस मंदिर का निर्माण किया जा रहा था तो इसमें बुध की एक मूर्ति स्थापित करने का निर्णय लिया गया। लेकिन लंबे समय तक खोज करने के बाद भी कोई ऐसा शिल्पकार नहीं मिल सका जो बुध की आकर्षक मूर्ति बना सकें। इसी क्रम में अचानक एक दिन एक व्यक्ति आया और उसने बुद्ध की मूर्ति बनाने की इच्छा जाहिर की। लेकिन इसके साथ साथ उसने कुछ शर्तें भी रखी। उनकी शर्त थी कि उसे पत्थर का एक स्तंभ तथा एक लैंप दिया जाएगा। और दूसरी शर्त थी कि मूर्ति बनाने के लिए उसे 6 महीने का समय चाहिए और वह मूर्ति मंदिर के अंदर बनाएगा। 6 महीने तक मंदिर का दरवाजा बंद रहना चाहिए और कोई भी मंदिर के अंदर नहीं रहेगा। लेकिन ग्राम वासियों उत्सुकता वस तय समय से 4 दिन पहले ही मंदिर के दरवाजे खोल दिए। जिससे मूर्ति की छाती वाला भाग पूर्ण रूप से तराशा नहीं जा सका। इस घटना के कुछ दिन बाद ही एक बौद्ध भिक्षु मंदिर में रहने लगे। उनके अनुसार महात्मा बुध एक दिन उनके सपने में आए और उन्होंने खुद बताया कि यह जो बुद्ध की मूर्ति इस मंदिर में लगी है उसे मैंने बनाया है।
महाबोधि मंदिर या महाबोधि महाविहार, यूनेस्को के विश्व धरोहर स्थल में 2002 में शामिल किया गया। बोधगया में बौद्ध मंदिर, उस स्थान को चिह्नित करता है जहां बुद्ध को ज्ञान प्राप्त हुआ था।
यह विहार मुख्य विहार या महाबोधि विहार के नाम से भी जाना जाता है। इस विहार की बनावट सम्राट अशोक द्वारा स्थापित स्तुप के समान है। इस विहार में गौतम बुद्ध की एक बहुत बड़ी मूर्ति स्थापित है।
यह मूर्ति पदमासन की मुद्रा में है। कहा जाता है कि यह मूर्ति उसी जगह स्थापित है जहां गौतम बुद्ध को ज्ञान बुद्धत्व (ज्ञान) प्राप्त हुआ था।
विहार के चारों ओर पत्थर की नक्काशीदार रेलिंग बनी हुई है।

महाबोधि मंदिर परिसर भगवान बुद्ध के जीवन से संबंधित चार पवित्र स्थानों में से एक है और विशेष रूप से इसे आत्मज्ञान की प्राप्ति के लिए जाना जाता है। पहले मंदिर का निर्माण सम्राट अशोक ने तीसरी शताब्दी ई. पू किया था और वर्तमान मंदिरों को 5वीं या 6ठीं शताब्दी ईसा पूर्व के दौरान निर्मित किया गया था।
इस विहार परिसर में उन सात स्थानों को भी चिन्हित किया गया है जहां बुद्ध ने ज्ञान प्राप्ित के बाद सात सप्ताह व्यतीत किया था। जातक कथाओं में उल्लेखित बोधि वृक्ष भी यहां है। यह एक विशाल पीपल का वृक्ष है जो मुख्य विहार के पीछे स्थित है। बुद्ध को इसी वृक्ष के नीचे ज्ञान प्राप्त हुआ था। वर्तमान में जो बोधि वृक्ष है वह उस बोधि वृक्ष की पांचवीं पीढी है।
बुद्ध ने छठा सप्ताह महाबोधि विहार के दायीं ओर स्थित मूचालिंडा क्षील के नजदीक व्यतीत किया था। यह क्षील चारों तरफ से वृक्षों से घिरा हुआ है। इस क्षील के मध्य में बुद्ध की मूर्त्ति स्थापित है।
इस मूर्त्ति में एक विशाल सांप बुद्ध की रक्षा कर रहा है। इस मूर्त्ति के संबंध में एक दंतकथा प्रचलित है। इस कथा के अनुसार बुद्ध ध्यान में इतने लीन थे कि उन्हें आंधी आने का पता न चला , बुद्ध जब मूसलाधार बारिश में फंस गए तो सांपों का राजा मूचालिंडा अपने निवास से बाहर आया और बुद्ध की रक्षा की।
महाबोधि मंदिर एक पवित्र बौद्ध धार्मिक स्थल है। क्योंकि ये वही स्थान है जहाँ पर गौतम बुद्ध को ज्ञान प्राप्त हुआ था। पश्चिमी हिस्से में पवित्र बोधि वृक्ष स्थित है। संरचना में
द्रविड़_वास्तुकला_शैली की झलक दिखती है।
विश्वास किया जाता है कि, महाबोधि मंदिर में स्थापित बुद्ध की मूर्त्ति का संबंध स्वयं बुद्ध से है। कहा जाता है कि जब इस मंदिर का निर्माण किया जा रहा था, तो इसमें बुद्ध की एक मूर्त्ति स्थापित करने का भी निर्णय लिया गया था। लेकिन लंबे समय तक किसी ऐसे शिल्पकार को खोजा नहीं जा सका जो बुद्ध की आकर्षक मूर्त्ति बना सके।
सहसा एक दिन एक व्यक्ति आया और उसने मूर्त्ति बनाने की इच्छा जाहिर की। लेकिन इसके लिए उसने कुछ शर्त्तें भी रखीं। उसकी शर्त्त थी कि, उसे पत्थर का एक स्तम्भ और एक लैम्प दिया जाए। उसकी एक और शर्त्त ये भी थी इसके लिए उसे छ: महीने का समय दिया जाए और समय से पहले कोई मंदिर का दरवाजा न खोले। सभी शर्त्तें मान ली गई। लेकिन व्यग्र गांव वालों ने तय समय से चार दिन पहले ही मंदिर के दरवाजे खोल दिए। मंदिर के अंदर एक बहुत ही सुंदर मूर्त्ति थी जिसका हर अंग आकर्षक था सिवाय छाती के। मूर्त्ति का छाती वाला भाग अभी पूर्ण रुप से तराशा नहीं गया था।
उसके कुछ समय बाद एक बौद्ध भिक्षु मंदिर के अंदर रहने लगा। एक बार बुद्ध उसके सपने में आए और बोले कि उन्होनें_स्वंय_अपनी_मूर्त्ति का निर्माण किया था। बुद्ध की ये मूर्त्ति बौद्ध जगत में सर्वाधिक प्रतिष्ठा प्राप्त मूर्त्ति है।
नालन्दा और विक्रमशिला के मंदिरों में भी इसी मूर्त्ति की प्रतिकृति को स्थापित किया गया है।
अगर आप बोधगया घूमने जा रहें हैं तो आपको राजगीर भी जरूर घूमना चाहिए। राजगीर में स्थित विश्व शांति स्तूप देखने में काफी आकर्षक और सुंदर है। राजगीर का स्तूप गिरिधर कूट पहाड़ी पर बनाया गया है। जहां तक आप रोपवे की सहायता से जा सकते हैं। इसका शुल्क ₹80 है। इस रोपवे का इस्तेमाल आप सुबह 8:00 बजे से दोपहर 1:00 बजे तक कर सकते हैं। इसके बाद यह दोपहर में 2:00 बजे से शाम के 5:00 बजे तक चालू रहता है। इस शांति स्तूप के निकट ही वेणु वन है। जिसके बारे में कहा जाता है कि महात्मा बुध एक बार इस वन में आए थे। राजगीर में प्रसिद्ध सप्तपर्णी गुफा है जहां महात्मा बुद्ध के निर्माण के बाद पहला धर्म सम्मेलन आयोजन किया गया था। सप्तपर्णी गुफा राजगीर बस पड़ाव से दक्षिण में स्थित गर्म जल के कुंड से 1000 सीढ़ियों की चढ़ाई चढ़ने पर आता है। बस पड़ाव से इस गुफा तक जाने का एकमात्र साधन घोड़ा गाड़ी ही है। जिसे यहां टमटम कहा जाता है। इस रोमांचित टमटम से आधे दिन घूमने का किराया ₹100 से लेकर ₹300 तक है। राजगीर के समीप ही विश्व विख्यात नालंदा विश्वा विद्यालय है। राजगीर से नालंदा मात्र 13 किलोमीटर की दूरी पर है। प्राचीन काल में यह नालंदा एक प्रसिद्ध विश्वविद्यालय हुआ करता था। अब तो इस विद्यालय के केवल अवशेष ही दिखाई देते हैं। नालंदा में एक संग्रहालय भी है। जिसमें यहां से खुदाई में प्राप्त वस्तुओं को संग्रहित कर दर्शकों के लिए रखा गया है। नालंदा से 5 किलोमीटर की दूरी पर एक प्रसिद्ध जैन तीर्थ स्थल पावापुरी स्थित है। यह स्थल भगवान महावीर से संबंधित है। पावापुरी में महावीर भगवान का एक भव्य मंदिर बनाया गया है। अगर आप नालंदा राजगीर जाएं तो इस तीर्थ स्थल पर जरूर जाएं। नालंदा से ही एक और तीर्थ स्थल सटा हुआ है जिसे हम बिहारशरीफ के नाम से जानते हैं। मध्यकाल में बिहार शरीफ का नाम ओदंतपुरी था। और यह एक मुस्लिम तीर्थ स्थल के रूप में प्रसिद्ध है। यहां मुस्लिमों का एक भव्य मस्जिद और एक बड़ी दरगाह है। इस बड़ी दरगाह के नजदीक लगने वाला रोशनी मेला मुस्लिम संप्रदाय में काफी प्रसिद्ध है। बिहारशरीफ के पास मनीराम का अखाड़ा है। अगर समय रहे आपके पास तो मनीराम के अखाड़ा को भी देखना चाहिए। स्थानीय लोगों की मान्यता के अनुसार इस अखाड़े में अगर आपको सच्चे दिल से कोई मन्नत मांगते हैं तो वह पूरी हो जाती है।
अगर आप बोधगया जाना चाहते है तो सबसे अच्छा साधन ट्रेन है। सरकार द्वारा गया, राजगीर, नालंदा, पावापुरी तथा बिहार शरीफ इन सभी स्थानों को घुमाने के लिए भारतीय रेल द्वारा एक विशेष ट्रेन बौद्ध परिक्रमा चलाई जाती है। इस ट्रेन के अलावा कई अन्य ट्रेन जैसे श्रमजीवी एक्सप्रेस, पटना राजगीर इंटरसिटी एक्सप्रेस, तथा पटना राजगीर पैसेंजर ट्रेन भी इन स्थानों को जाती है। इसके अलावा अगर आप सड़क मार्ग से जाना चाहते हैं तो भी बहुत आराम से जा सकते हैं। अगर आप हवाई मार्ग से जाना चाहते हैं तो नजदीकी हवाई अड्डा 7 किलोमीटर की दूरी पर है जहां से आप मैक्सिमम 20 मिनट में पहुंच जाएंगे। गया से कोलकाता और बैंकॉक के लिए साप्ताहिक उड़ाने चलती हैं।
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