रत्नेश्वर महादेव मंदिर मणिकर्णिका घाट के सामने पानी में निर्मित एक अद्भुत मंदिर है। रत्नेश्वर महादेव मंदिर 9 डिग्री झुका हुआ है। यह मंदिर लगभग साल भर पानी में डूबा रहता है। कुछ दिनों के लिए यह मंदिर पानी से बाहर होता है। जिस वजह से इस मंदिर में पूजा पाठ नहीं हो पाती है। क्योंकि जब यह मंदिर पानी से कुछ दिनों के लिए बाहर निकलता है तो बालू और कीचड़ से भरा रहता है। साफ सफाई के बाद कुछ दिन इस मंदिर में पूजा संपन्न हो पाती है।
बताते चलें की इटली स्थित लीनिगं टावर आफ पीसा अपने झुकाव के कारण पूरे विश्व में विख्यात है। जबकि पिसा की मीनार इस मंदिर से 4 डिग्री कम झुकी हुई है। फिर भी इतिहास के किसी भी पन्ने पर इस रत्नेश्वर महादेव मंदिर का कोई जिक्र नहीं है। पिसा की मीनार अपने नींव से 5 डिग्री झुकाव की वजह से पूरी दुनिया में मशहूर है।
मणिकर्णिका घाट पर मणिकर्णिका कुंड के ठीक सामने स्थित रत्नेश्वर महादेव मंदिर भारतीय वास्तुकला का अद्भुत नमूना है। यह मंदिर गुजराती शैली में निर्मित है। इतना वजनी होने के बाद भी यह मंदिर सैकड़ों साल से 9 डिग्री झुकाव के साथ खड़ा है।
वैसे तो काशी को मंदिरों का शहर कहा ही जाता है। लेकिन मणिकर्णिका घाट पर स्थित रत्नेश्वर महादेव मंदिर की बात ही निराली है। यह मंदिर साल भर पानी में डूबे रहने के बावजूद सैकड़ों सालों से पानी के थपेड़ों को बर्दाश्त करता आया है। यह मंदिर अहिल्याबाई होलकर के एक दासी जिसका नाम रत्ना था, की इच्छा पर बनाया गया था। अहिल्याबाई होल्कर ने काशी में अनेक मंदिरों और घाटों का निर्माण कराया था।
अहिल्याबाई होल्कर की दासी ने एक महादेव मंदिर के निर्माण की इच्छा जताई थी। उसकी इच्छा का मान रखते हुए महारानी अहिल्याबाई ने गुजराती शैली में इस महादेव मंदिर का निर्माण कराया। स्थानीय लोगों के अनुसार यह मंदिर अपने निर्माण के कुछ ही सालों में एक तरफ झुक गया और तब से यह मंदिर 9 डिग्री के झुकाव के साथ खड़ा है।
इस मंदिर को लेकर काशी में अनेक दंत कथाएं भी प्रचलित है। एक स्थानीय पुजारी के अनुसार किसी व्यक्ति द्वारा अपनी मातृऋण से बरी होने के लिए इस मंदिर का निर्माण कराया गया । लेकिन अपने निर्माण के कुछ ही दिनों बाद यह मंदिर एक तरफ झुक गया। उसके बाद लोगों ने कहा कि मातृऋण से कोई बरी नहीं हो सकता है।
स्थानीय लोगों के मतानुसार सरकार को इस मंदिर के बचाव के लिये कुछ करना चाहिए। जिससे इस अद्भुत धरोहर को आने वाली पीढ़ियों के लिए संरक्षित किया जा सके।

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