पुरुष हो, पुरुषार्थ करो, उठो।
पुरुष क्या, पुरुषार्थ हुआ न जो;
हृदय की सब दुर्बलता तजो।

प्रबल जो तुममें पुरुषार्थ हो—
सुलभ कौन तुम्हें न पदार्थ हो?
प्रगति के पथ में विचरो उठो;
पुरुष हो, पुरुषार्थ करो, उठो॥
न पुरुषार्थ बिना कुछ स्वार्थ है;
न पुरुषार्थ बिना परमार्थ है।
समझ लो, यह बात यथार्थ है—
कि पुरुषार्थ वही परमारथ है।
भुवन में सुख-शांति भरो उठो;
पुरुष हो, पुरुषार्थ करो, उठो॥
न पुरुषार्थ बिना वह स्वर्ग है;
न पुरुषार्थ बिना अपवर्ग है।
न पुरुषार्थ बिना क्रियता कहीं,
न पुरुषार्थ बिना प्रियता कहीं।
सफलता वर-तुल्य वरो, उठो;
पुरुष हो, पुरुषार्थ करो, उठो॥
न जिसमें कुछ पौरुष हो यहाँ—
सफलता वह पा सकता कहाँ?
अपुरुषार्थ भयंकर पाप है;
न उसमें यश है, न प्रताप है।
न कृमि-कीट-समान मरो, उठो;
पुरुष हो, पुरुषार्थ करो, उठो॥
मनुज जीवन है जय के लिए—
प्रथम ही दृढ़ पौरुष चाहिए।
विजय तो पुरुषार्थ बिना कहाँ;
कठिन है चिरजीवन भी यहाँ।
भय नहीं, भव-सिंधु तरो, उठो;
पुरुष हो, पुरुषार्थ करो, उठो॥
यदि अनिष्ट अड़े, अड़ते रहें;
विपुल विघ्न पड़ें, पड़ते रहें।
हृदय में पुरुषार्थ रहे भरा—
जलधि क्या, नभ क्या, फिर क्या धरा?
दृढ़ रहो, ध्रुव धैर्य धरो, उठो;
पुरुष हो, पुरुषार्थ करो, उठो॥
यदि अभीष्ट तुम्हें निज सत्व है;
प्रिय तुम्हें यदि मान महत्व है।
यदि तुम्हें रखना निज नाम है;
जगत में करना कुछ काम है।
मनुज! तो श्रम से न डरो, उठो;
पुरुष हो, पुरुषार्थ करो, उठो॥
प्रकट नित्य करो पुरुषार्थ को,
हृदय से तज दो सब स्वार्थ को।
यदि कहीं तुमसे परमार्थ हो—
यह विनश्वर देह कृतार्थ हो।
सदय हो, पर दु:ख हरो, उठो;
पुरुष हो, पुरुषार्थ करो, उठो॥
मैथिलीशरण गुप्त — संक्षिप्त परिचय
आपका जन्म: 3 अगस्त 1886, चिरगाँव, झाँसी, उत्तर प्रदेश में हुआ था। आपकी मृत्यु: 12 दिसंबर 1964 में हो गया।
- खड़ी बोली में हिंदी कविता के अग्रदूत, विशेषतः “भारत-भारती” और “साकेत” जैसे रचनाओं के लिए प्रसिद्ध
- महात्मा गांधी द्वारा “राष्ट्रकवि” की उपाधि से सम्मानित
- भारत सरकार द्वारा 1954 में पद्मभूषण पुरस्कार से सम्मानित
Leave a Reply