रक्षाबंधन भारत के प्रमुख त्योहारों में से एक है, जो भाई-बहन के पवित्र रिश्ते और सामाजिक सौहार्द्र का प्रतीक है। परंतु जब हम राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) की बात करते हैं, तो यह पर्व एक व्यक्तिगत रिश्ते की सीमाओं से निकलकर सामाजिक एकता, राष्ट्रप्रेम और सांस्कृतिक जागरूकता का माध्यम बन जाता है। संघ ने रक्षाबंधन को केवल एक पारंपरिक पर्व नहीं रहने दिया, बल्कि उसे राष्ट्र रक्षा और सांस्कृतिक संरक्षण से जोड़ा है।

रक्षाबंधन का पारंपरिक महत्व

रक्षाबंधन हिन्दू धर्म का एक महत्वपूर्ण पर्व है जिसमें बहनें अपने भाइयों की कलाई पर रक्षा-सूत्र (राखी) बाँधती हैं और उनकी दीर्घायु व सुख-समृद्धि की कामना करती हैं। भाई भी बहन की रक्षा का वचन देता है। किंवदंतियों में इंद्राणी द्वारा इंद्र को रक्षा-सूत्र बाँधना, रानी कर्णावती द्वारा हुमायूँ को राखी भेजना आदि इस पर्व के ऐतिहासिक आयाम हैं।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना और विचारधारा

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार ने 1925 में की थी। यह संगठन भारतीय संस्कृति, राष्ट्रवाद और सामाजिक समरसता को पुनर्स्थापित करने के उद्देश्य से कार्य करता है। संघ यह मानता है कि भारत एक सांस्कृतिक राष्ट्र है, और इसकी एकता को बनाए रखने के लिए केवल राजनीतिक नहीं, बल्कि सामाजिक व सांस्कृतिक चेतना भी आवश्यक है।

संघ की दृष्टि में रक्षाबंधन का महत्व

RSS के दृष्टिकोण में रक्षाबंधन केवल एक पारिवारिक पर्व नहीं है, बल्कि यह “सामाजिक बंधन” और “राष्ट्रीय कर्तव्य” का प्रतीक है। संघ ने इस पर्व को समाज में भाईचारे, सौहार्द्र और आत्मीयता को बढ़ावा देने का एक माध्यम बनाया है।

1. सामाजिक समरसता का प्रतीक

संघ की शाखाओं में रक्षाबंधन पर्व पर स्वयंसेवक एक-दूसरे को राखी बाँधते हैं – जाति, वर्ग, भाषा, क्षेत्र से परे जाकर। यह कृत्य सामाजिक समरसता और एकता का अद्भुत उदाहरण है।

2. राष्ट्र की रक्षा का संकल्

संघ रक्षाबंधन को “राष्ट्र रक्षा संकल्प दिवस” के रूप में देखता है। शाखाओं में इस दिन स्वयंसेवक भारत माता को राखी बाँधकर यह संकल्प लेते हैं कि वे राष्ट्र की रक्षा के लिए सदैव तत्पर रहेंगे।

3. बहनों के सम्मान और सुरक्षा का सन्देश

संघ रक्षाबंधन के माध्यम से समाज में महिला सुरक्षा और सम्मान का भी संदेश देता है। कई शाखाओं में स्थानीय बहनों से राखी बंधवाकर स्वयंसेवक यह वचन लेते हैं कि वे नारी के सम्मान और अधिकारों की रक्षा करेंगे।

4. सीमाओं पर सैनिकों से जुड़ाव

संघ और उसके सहयोगी संगठन रक्षाबंधन के अवसर पर सीमाओं पर तैनात सैनिकों को राखियाँ भेजते हैं और उनके त्याग को नमन करते हैं। यह राष्ट्रीय एकता और सैनिकों के प्रति सम्मान का प्रतीक बन चुका है।

एक सांस्कृतिक आंदोलन का स्वरूप

संघ के लिए रक्षाबंधन केवल एक रस्म नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक आंदोलन है – जो लोगों को अपनी जड़ों से जोड़ता है, और भारत की एकात्म संस्कृति को पुनः जागृत करता है। यह पर्व संघ की मूल भावना – “संघटन, सेवा और संस्कार” – को जन-जन तक पहुँचाने का माध्यम बनता है।

वार्षिक उत्सवों की भांति, संघ की शाखाओं में रक्षाबंधन पर्व विशेष आयोजन के साथ मनाया जाता है – जिसमें बौद्धिक, गीत, सरस्वती वंदना, रक्षासूत्र बंधन और राष्ट्र रक्षा शपथ प्रमुख रूप से होते हैं। कई बार राखियाँ सैनिकों, पुलिस कर्मियों, सफाई कर्मियों और समाज के अन्य सेवकों को भी बाँधी जाती हैं।

रक्षाबंधन, जहाँ एक ओर पारिवारिक भावनाओं का पर्व है, वहीं राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने इसे एक सांस्कृतिक और राष्ट्रनिर्माण के पर्व का रूप दिया है। यह प्रयास न केवल सामाजिक समरसता को बढ़ावा देता है, बल्कि आने वाली पीढ़ियों को यह सिखाता है कि हमारे पर्व केवल उत्सव नहीं, कर्तव्यबोध और राष्ट्रसेवा के सशक्त माध्यम भी हो सकते हैं।

रक्षाबंधन केवल धागा नहीं, एक विचार है — जो बाँधता है भारत की आत्मा को एक डोर में।”

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