नई दिल्ली, 6 अगस्त 2025:
चेक बाउंस से जुड़े मामलों को लेकर देशभर में चल रही असमंजस की स्थिति पर अब पूर्णविराम लग गया है। भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने हाल ही में यह स्पष्ट किया है कि चेक बाउंस (धारा 138, NI Act) के मामलों में अब एफआईआर या केस दर्ज करने की प्रक्रिया उसी स्थान पर होगी, जहाँ पर चेक जारी करने वाला बैंक खाता स्थित है।
इस निर्णय से कई व्यवसायियों, उपभोक्ताओं और वकीलों को राहत मिली है, क्योंकि पहले इन मामलों में क्षेत्राधिकार (Jurisdiction) को लेकर काफी विवाद होते थे। कई बार लेनदार अपनी सुविधा के अनुसार किसी भी राज्य या शहर में केस दर्ज करवा देता था, जिससे चेक जारी करने वाले को लंबी दूरी तय कर कानूनी कार्यवाही का सामना करना पड़ता था।
🔍 क्या कहा सुप्रीम कोर्ट ने?
सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया:
“धारा 138 के तहत दर्ज मामला तभी वैध माना जाएगा जब वह उस क्षेत्राधिकार की अदालत में दायर किया गया हो, जहाँ पर डिफॉल्टर का बैंक खाता स्थित है और चेक को प्रस्तुत कर रिजेक्ट किया गया हो।”
📜 कानूनी विशेषज्ञों की राय
वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत चौधरी का कहना है:
“यह फैसला उन लोगों के लिए बड़ी राहत है जो छोटे व्यापारी हैं या अन्य शहरों में व्यापार करते हैं। अब उन्हें बेवजह दूर-दराज की अदालतों में पेश होने से राहत मिलेगी।”
🧾 चेक बाउंस से जुड़ा कानूनी प्रावधान (Section 138, NI Act)
धारा 138, Negotiable Instruments Act, 1881 के अंतर्गत अगर कोई व्यक्ति बैंक से चेक जारी करता है और वह पर्याप्त धन के अभाव में बाउंस हो जाता है, तो यह एक दंडनीय अपराध है, जिसमें:
दो साल तक की सजा या दोगुना जुर्माना या दोनों दंड हो सकते हैं।
📍 नए फैसले के प्रभाव
मूल स्थान पर केस दर्ज होगा: अब केस उसी कोर्ट में दर्ज होगा जहाँ से चेक जारी किया गया है और वहाँ के बैंक ने उसे “Dishonour” किया है। झूठे मुकदमों पर रोक: यह निर्णय झूठे केस या मानसिक उत्पीड़न के मामलों में कमी लाएगा। न्याय प्रक्रिया में पारदर्शिता: क्षेत्राधिकार को लेकर होने वाले विवाद अब लगभग समाप्त हो जाएंगे।
सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला न्यायिक पारदर्शिता और व्यावहारिकता की दिशा में एक बड़ा कदम है। इससे व्यवसायिक लेन-देन में बढ़ती कानूनी जटिलताओं पर अंकुश लगेगा और चेक बाउंस से जुड़े मामलों में न्याय प्राप्त करना अधिक सरल और व्यवस्थित होगा।
📢 जनता और व्यापारी वर्ग से अपील:
सभी व्यापारियों और खाताधारकों को अब अपने चेक के भुगतान और लेन-देन में विशेष सतर्कता बरतनी चाहिए, ताकि उन्हें इस प्रकार की कानूनी परेशानी का सामना न करना पड़े।

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